बुधवार, 20 जून 2012

यह स्वर्ण पंछी था कभी...

यह स्वर्ण पंछी था कभी....

यह स्वर्ण पंक्षी था कभी,
मृतप्राय घोषित कर दिया,
भूमि सात्विक थी कभी
मद्पेय क्लेशित कर दिया!

आक्षेप किस पर क्या रखू
अवयव निरूपित हूँ स्वयं,
यह स्वर्ण पंक्षी है वही
जो जी रहा रहमो करम!

तू मार्ग दर्शक था कभी
अब्बल में पाई सभ्यता,
तर्कस में तेरे बाण है,
पर कोई न एकलव्य सा!

कलंक की गठरी मेरी,
काँधो पर तेरे रख दिया,
यह स्वर्ण पंक्षी था कभी
मृतप्राय घोषित कर दिया!

शागिर्द तुझको कह रहे
प्रतिपल तुझे है कूटते.
सर्वत्र यह संघर्ष है
आक्षेप दूजों के लिये!

मृतप्राय इसको कर दिया,
अटका हुआ थोड़ा जिया,
आशा लगाए बैठी है,
अबला
,जियेगा अब पीया!

बस नब्ज इसकी चल रही
कर्जो से दिल बैठा हुआ,
इस तख्त के संघर्ष में
कंगाल इसको कर दिया!

सर्दी हुई थी, जब इसे
इमली खिलाकर बल दिया,
यह स्वर्ण पंक्षी था कभी,
मृतप्राय घोषित कर दिया!

dheerendra,"dheer"

53 टिप्‍पणियां:

  1. शनिवार 23/06/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. आपके सुझावों का स्वागत है . धन्यवाद!

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  2. देश काल की चाल का, सही निरूपण मित्र ।

    अक्षरश: हैं खींचते, चिड़िया चित्र विचित्र ।

    चिड़िया चित्र विचित्र, गई अब चिड़िया सोने ।

    सोने की उस काल, आज भी देख नमूने ।

    रविकर धरिये धीर, पीर यह बढती जाए ।

    जो मारे सो मीर, कहावत डाकू गाये ।।

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  3. सोने की चिड़िया आज पंखविहीन हो गयी लगती है....लेकिन यह भी एक आभास मात्र है, भारत के पास एक ऐसा धन है जो कभी समाप्त नहीं हो सका...

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  4. कलंक की गठरी मेरी,
    काँधो पर तेरे रख दिया,
    यह स्वर्ण पंक्षी था कभी
    मृतप्राय घोषित कर दिया! लाजबाब रचना

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  5. बहुत सुन्दर भावप्रणव रचना!
    इसको साझा करने के लिए आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी पोस्ट कल 21/6/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें

    चर्चा - 917 :चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  7. कलंक की गठरी मेरी,
    काँधो पर तेरे रख दिया,
    यह स्वर्ण पंक्षी था कभी
    मृतप्राय घोषित कर दिया!

    बहुत सुन्दर हृदयस्पर्शी भावाभिव्यक्ति....

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  8. बहुत सुन्दर रचना...
    कलंक की गठरी मेरी,
    काँधो पर तेरे रख दिया,
    यह स्वर्ण पंक्षी था कभी
    मृतप्राय घोषित कर दिया!

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  9. ये है मेरा इंडिया क्या बात है बोल श्री मनमोहन की जै बोल श्री सोनिया मम्मी की जै ... . .कृपया यहाँ भी पधारें -


    ram ram bhai
    बुधवार, 20 जून 2012
    ये है मेरा इंडिया
    ये है मेरा इंडिया

    http://veerubhai1947.blogspot.in/

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  10. कलंक की गठरी मेरी,
    काँधो पर तेरे रख दिया,
    यह स्वर्ण पंक्षी था कभी
    मृतप्राय घोषित कर दिया!

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति !!

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  11. बहुत लाजवाब अभिव्यक्ति !!!!

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  12. है देश बनता लोक से
    अन्यथा मृदा औ स्वर्ण क्या
    है दोष देता हर कोई
    सोचें स्वयं कि क्या किया!

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  13. तू मार्ग दर्शक था कभी
    अब्बल में पाई सभ्यता,
    तर्कस में तेरे बाण है,
    पर कोई न एकलव्य सा ...

    ये सच है की देश ये सब था ... पहले अब भी हो सकता है अगर देश के नौजवान उसी भूमिका में दुबारा आ जाएँ ...

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  14. स्वर्ण पंक्षी था कभी
    आपकी रचना ने जीवित कर दिया

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  15. स्वर्ण पक्षी नहीं पर पक्षी तो अभी भी है .... पंख नोचे जा रहे हैं फिर भी अपने दम पर उड़ान जारी है

    बहुत सुंदर प्रस्तुति

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  16. सार्थक चिंतन के साथ उत्तम रचना .

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  17. कलंक की गठरी मेरी,
    काँधो पर तेरे रख दिया,
    यह स्वर्ण पंक्षी था कभी
    मृतप्राय घोषित कर दिया!
    sundar panktiyaan ....

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  18. बस नब्ज इसकी चल रही
    कर्जो से दिल बैठा हुआ,
    इस तख्त के संघर्ष में
    कंगाल इसको कर दिया!

    आदरणीय धीरेन्द्र जी ..खूबसूरत प्रस्तुति ..इस पक्षी को हार नहीं माननी है अभी भी बड़ा दम है ...उड़ान भरते चले ....
    बधाई हो
    भ्रमर ५

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  19. भास्कर भूमि में already पढ़ी ये रचना..
    निस्संदेह सुन्दर..
    सादर

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  20. शुचिता की संजीवनी चाहिए,,, स्वर्ण-पंछी पुनर्जीवित हो उठेगा

    सुंदर रचना

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  21. बहुत सुन्दर......................
    प्यारी रचना.......................

    सादर

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  22. बहुत सुन्दर प्रस्तुति क्षमा चाहती हूँ देर से पढ़ी ...बहुत पसंद आई

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  23. बहुत सुन्दर और सार्थक रचना |
    आशा

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  24. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति....

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  25. बस नब्ज इसकी चल रही
    कर्जो से दिल बैठा हुआ,
    इस तख्त के संघर्ष में
    कंगाल इसको कर दिया!
    sunder bhavon se bhari kavita
    rachana

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  26. बस नब्ज इसकी चल रही

    स्वर्ण पक्षियों का यही हाल होता है ...
    बहुत सुन्दर भाव .. सामाजिक सरोकार युक्त

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  27. बस नब्ज इसकी चल रही
    कर्जो से दिल बैठा हुआ,
    इस तख्त के संघर्ष में
    कंगाल इसको कर दिया!
    samsamyik dil ko chhune wali rachna !

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  28. कलंक की गठरी मेरी,
    काँधो पर तेरे रख दिया,
    यह स्वर्ण पंक्षी था कभी
    मृतप्राय घोषित कर दिया!

    गहन भाव,अति सुंदर.........

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  29. apne bilkul sahi bat ki......desh ko logo ne puri tarah se loot liya....bahut badhiya

    उत्तर देंहटाएं
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    उम्दा लेखन, बेहतरीन अभिव्यक्ति


    हिडिम्बा टेकरी
    चलिए मेरे साथ



    ♥ आपके ब्लॉग़ की चर्चा ब्लॉग4वार्ता पर ! ♥

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    उत्तर देंहटाएं
  31. बहुत ही सार्थक और बेहतरीन रचना...
    :-)

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  32. वह स्वर्ण पंछी आज भी है
    जीवित पंख विहीन
    पुनः उगेंगे पँख
    भूमि यह नहीं हुई श्री विहीन
    नहीं हुई श्री विहीन
    अभी है बाकि दमखम
    फिर चहकेगी हर बगिया में
    भारत भू के नभ मण्डल पर ...।

    ....धन्यवाद ।

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  33. सुन्दर चित्रण... खूबसूरत रचना...
    सादर बधाई।

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  34. bahut hee sunder rachna...sone kee chidia phir se chhke iske liye ham sabhi ko milkar prayas karna padega

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  35. बहुत उम्दा अभिव्यक्ति!

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आपकी टिप्पणियाँ मेरे लिए अनमोल है...अगर आप टिप्पणी देगे,तो निश्चित रूप से आपके पोस्ट पर आकर जबाब दूगाँ,,,,आभार,