रविवार, 26 फ़रवरी 2012

चिंगारी...



चिंगारी

अपने घर में अपने हाथों आग लगाते देखे लोग
आग लगाकर खुदही उसमे जलभून जाते देखे लोग
जो भी करेगा बच पायेगा इसकी क्या गारंटी है,
फिर भी घात लगाकर हमने बम बरसाते देखे लोग

सफेद लबादा पहनके तनमें दलाली करते देखे लोग
अब तो रोज झूठ के हक़में शोर मचाते देखे लोग
सच को सच कह देने वाले पता नही वो कहाँ गए
कुछ सिक्कों के बदले पूरा देश बेचते देखे लोग

अपनी बात मनवाने को अनसन करते देखे लोग
देशभक्ति के गीत गली में खुलकर गाते देखे लोग.
अपने आँगन में बँदूके बोकर उन्हें सींचते रहते जो
बैठ शान्ति सभाओं में ऐसे ही आतेजाते देखे लोग
==============
DHEERENDRA
,

56 टिप्‍पणियां:

  1. आतंकी महफूज हैं, सामर्थ्यहीन कानून ।

    खुलेआम बाजार में, दे मानवता भून ।।


    गली मुहल्ले चौराहे पर, मिलते सदा दलाल ।

    न हर्रे ना फिटकरी, उनकी गोटी लाल ।।



    नेता पर मत मूतना, पूरा गया घिनाय ।

    खाद और पानी मिले, दूर तलक जा छाय ।।

    दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक

    http://dineshkidillagi.blogspot.in

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  2. आस बेंचते पास में , मिलते दुष्ट दलाल ।
    न हर्रे ना फिटकरी, उनकी गोटी लाल ।।

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  3. क्रान्तिकारी भावनाओं का अभिवादन , सामाजिक अस्त-व्यस्तता के प्रति बेचैनी ,मुखर है , साहित्यिक उद्धरण में ,शब्दों को सहेजने की आवश्यकता है / बधाई /

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  4. सच को सच कह देने वाले पता नही वो कहाँ गए
    कुछ सिक्कों के बदले पूरा देश बेचते देखे लोग
    ....अब तो बस ढूंढते रह जायेंगे

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  5. सच को सच कह देने वाले पता नही वो कहाँ गए
    कुछ सिक्कों के बदले पूरा देश बेचते देखे लोग

    सत्य को शब्दों में उकेरती अच्छी रचना।

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  6. कैसे कैसे लोग!
    सत्य उकेरती रचना!

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  7. satya ke saye men aaj bhi mahfooj haen mere vatan ke log.........
    ye bat aur hae unhaen prkha nahin jata hae .sarthak post hae dheerendraji .

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  8. सत्य को रेखांकित करती सशक्त रचना...
    सादर बधाई.

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  9. डुबाने वाले यह भूल जाते हैं कि वे स्वयं भी डूब सकते हैं।

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  10. सच को सच कह देने वाले पता नही वो कहाँ गए..??
    क्या बात है ! माकूल सवाल उठाती कविता !

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  11. बहुत सुंदर प्रस्तुति । Welcome to my New Post.

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  12. आज के परिदृश्य को भली प्रकार प्रकट किया इस गीत के माध्यम से.....अच्छा व्यंग्य

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  13. सारा कुछ सच सच कह डाला...बहुत सटीक!!

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  14. कल 27/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  15. :सच को सच कह देने वाले पता नही वो कहाँ गए
    कुछ सिक्कों के बदले पूरा देश बेचते देखे लोग"

    वाह !!! क्या बात है... सुन्दर पंक्तियां.

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  16. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 27-02-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  17. सफेद लबादा पहनके तनमें दलाली करते देखे लोग
    अब तो रोज झूठ के हक़में शोर मचाते देखे लोग
    सच को सच कह देने वाले पता नही वो कहाँ गए
    कुछ सिक्कों के बदले पूरा देश बेचते देखे लोग।

    वर्तमान व्यवस्था पर तीखा प्रहार करती सुंदर प्रस्तुति।

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  18. जो भी करेगा बच पायेगा इसकी क्या गारंटी है,
    फिर भी घात लगाकर हमने बम बरसाते देखे लोग

    एकदम सच कहा धीरेन्द्र जी, एक सार्थक और सामयिक रचना के लिए बधाई... आशा करती हूँ.. इस तरह की रचनाएँ पढ़ कर शायद लोगों की सोच के दरवाजे खुलें...

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  19. बढ़िया व्यंग्य ..
    kalamdaan.blogspot.in

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  20. सशक्त रचना..
    अपने आँगन में बँदूके बोकर उन्हें सींचते रहते जो
    बैठ शान्ति सभाओं में ऐसे ही आतेजाते देखे लोग...

    बहुत खूब..
    सादर.

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  21. सुन्दर सृजन ,
    सार्थक पोस्ट, आभार.

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  22. अब देखने सुनने का वक़्त नहीं बाकी है
    चिंगारी को हवा देना बाकी है ..... सुंदर प्रस्तुति

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  23. अपने आँगन में बँदूके बोकर उन्हें सींचते रहते जो
    बैठ शान्ति सभाओं में ऐसे ही आतेजाते देखे लोग ...

    आज का सच उतारा है रचना में ... तीखा व्यंग है ...

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  24. जो भी करेगा बच पायेगा इसकी क्या गारंटी है,
    फिर भी घात लगाकर हमने बम बरसाते देखे लोग
    ये बात इस ग़ज़ल की जान है। इनका अंत वही होता है जो शंका इसमें दर्शाई गई है।

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  25. सत्य कहती रचना |बधाई |
    आशा

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  26. जो भी करेगा बच पायेगा इसकी क्या गारंटी है,
    फिर भी घात लगाकर हमने बम बरसाते देखे लोग
    यह शे’र इस पूरे ग़ज़ल की जान है। ऐसे लोगों का अंत वैसा ही होता है जिसकी शंका इस ग़ज़ल में जताई गई है।

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  27. बड़ा ही सुन्दर कटाक्ष है ! वाकई आज ऐसे ही लोगों की भीड़ है जिनके मन में कुछ और है और मुख पर कुछ और ! सार्थक एवं सशक्त प्रस्तुति के लिये बधाई !

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  28. सच बोलती रचना....सशक्त और गंभीर !

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  29. सच को सच कह देने वाले पता नही वो कहाँ गए
    कुछ सिक्कों के बदले पूरा देश बेचते देखे लोग

    wah dheerendr ji bilkul yatharth chitran ...badhai sweekaren.

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  30. धीरेन्द्र जी अदभुत रचना ! बधाई

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  31. आज की व्यवस्था प्र सटीक टिप्पणी. ससक्त रचना.

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  32. कविता के शब्द शब्द अपने आप में चिंगारी हैं!!

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  33. अपने आँगन में बँदूके बोकर उन्हें सींचते रहते जो
    बैठ शान्ति सभाओं में ऐसे ही आतेजाते देखे लोग

    ....आज की व्यवस्था का बहुत सटीक चित्रण..

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  34. आज की सच्चाई से रूबरू कराती रचना आभार

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  35. काश! अच्छा और शुभ देखने को मिले.
    कीचड़ में कमल भी होते ही हैं.
    पर कीचड़ में डूबे रहें तो साम्राज्य कीचड़ का ही दिखलाई पड़ता है.
    सूरज का चिंतन करते रहने से कमल कीचड़ से ऊपर उठ जाता है.

    आईये सूर्य का,प्रकाश का चिंतन करें.कमल बनें,कीचड़ से बाहर आएं.

    आपकी सुन्दर प्रस्तुति का आभार, जो सद विचार की ओर उन्मुख
    कर रही है.

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  36. देश की दशा और दिशा के साथ संवाद करती ग़ज़ल ,ये आशिक और माशूक की बातचीत नहीं भितरघातियों का आतंक है अन्दर से बाहर से .

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  37. खरी खरी सच्चाई का बयान करती कविता... बढ़िया प्रस्तुति !

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  38. अपनी बात मनवाने को अनसन करते देखे लोग
    देशभक्ति के गीत गली में खुलकर गाते देखे लोग.
    अपने आँगन में बँदूके बोकर उन्हें सींचते रहते जो
    बैठ शान्ति सभाओं में ऐसे ही आतेजाते देखे लोग
    sarthak rachna badhiya ........

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  39. vastvikta ko shabdon me bahut sateek roop me prastut kiya hai aapne .badhai .

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  40. सफेद लबादा पहनके तनमें दलाली करते देखे लोग
    अब तो रोज झूठ के हक़में शोर मचाते देखे लोग
    सच को सच कह देने वाले पता नही वो कहाँ गए
    कुछ सिक्कों के बदले पूरा देश बेचते देखे लोग
    sach kaha hai aapne.

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  41. सामयिक रचना...चिंगारी को आग बनाने की ज़रूरत है .

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  42. देश के सेवक उलघ गये है कोठी बांग्ला करो मे........

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  43. सफेद लबादा पहनके तनमें दलाली करते देखे लोग
    अब तो रोज झूठ के हक़में शोर मचाते देखे लोग
    सच को सच कह देने वाले पता नही वो कहाँ गए
    कुछ सिक्कों के बदले पूरा देश बेचते देखे लोग
    satya hi to hai ,badhiya .main kai dino me net par aati hoon is karan jaan nahi pati nai post dali ki nahi ,phir bhi mafi chahti hoon .

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  44. ....आज की व्यवस्था का बहुत सटीक चित्रण...धीरेन्द्र जी

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  45. अति उत्तम,सराहनीय प्रस्तुति... !!

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  46. सफेद लबादा पहनके तनमें दलाली करते देखे लोग
    अब तो रोज झूठ के हक़में शोर मचाते देखे लोग
    सच को सच कह देने वाले पता नही वो कहाँ गए
    कुछ सिक्कों के बदले पूरा देश बेचते देखे लोग
    ........behad sunder satik rachna ..........sahi kaha aapne ..aaj desh kahan ja raha hai .....koi use nahi rok pa raha hai ......badhai . sarthak post ke liye .

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  47. आन्दोलित करती कविता.....बधाई...

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